BPSC Teacher Recruitment: बिहार में BPSC TRE-3 के तहत हुई शिक्षक नियुक्ति को लेकर आरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। जांच के दौरान ऐसे शिक्षकों की जानकारी सामने आई है, जिनका आवासीय पता बिहार से बाहर का बताया जा रहा है, लेकिन उन्हें बिहार की आरक्षित श्रेणियों का लाभ देकर शिक्षक पद पर नियुक्त किया गया। मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने जिलों और प्रखंड स्तर पर नियुक्त शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश और ओडिशा के कुछ अभ्यर्थियों को बिहार की आरक्षित श्रेणियों में नियुक्ति मिलने की शिकायत सामने आई है। इनमें पिछड़ा वर्ग और आरक्षित महिला कोटे से नियुक्ति पाने वाले अभ्यर्थी शामिल बताए जा रहे हैं। शुरुआती जांच में एक दर्जन से अधिक ऐसे शिक्षकों की जानकारी सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि, जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने अभ्यर्थियों ने नियमों के विपरीत आरक्षण का लाभ लिया और इसके लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।
आरक्षण प्रमाणपत्र और आवासीय दस्तावेजों की जांच:
शिक्षा विभाग अब TRE-3 के तहत नियुक्त शिक्षकों के दस्तावेजों की श्रेणीवार जांच करा रहा है। इसमें अभ्यर्थियों के आवासीय प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, आरक्षण से जुड़े दस्तावेज और नियुक्ति के समय जमा कराए गए अन्य प्रमाणपत्रों की जांच की जा रही है। विभाग यह भी देख रहा है कि जिस श्रेणी में किसी अभ्यर्थी का चयन हुआ, क्या वह उस श्रेणी के लिए निर्धारित नियमों और पात्रता को पूरा करता था। इसके साथ ही काउंसिलिंग के दौरान दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई, इसकी भी पड़ताल की जा रही है। अलग-अलग प्रखंडों से सामने आ रही जानकारी ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है। कुछ प्रखंडों में चार से पांच ऐसे शिक्षकों की जानकारी मिलने की बात कही जा रही है। पांच से छह प्रखंडों की रिपोर्ट अभी आना बाकी बताई जा रही है। ऐसे में जांच पूरी होने के बाद संदिग्ध नियुक्तियों की संख्या बढ़ सकती है।
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों से मांगा जाएगा शपथपत्र:
शिक्षा विभाग इस मामले को केवल दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं रखना चाहता। जानकारी के अनुसार जांच पूरी होने के बाद सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों से शपथपत्र भी लिया जाएगा। इस शपथपत्र में अधिकारियों को यह प्रमाणित करना होगा कि उनके प्रखंड में बिहार से बाहर के किसी अभ्यर्थी को बिहार की आरक्षित श्रेणी का अनुचित लाभ देकर नियुक्त नहीं किया गया है। इससे जांच की जिम्मेदारी प्रखंड स्तर पर भी तय होगी। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच होती है। यदि किसी स्तर पर गलत प्रमाणपत्र या गलत श्रेणी को स्वीकार किया गया है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी जांच का अहम हिस्सा होगा।
सरैया में चार महिला शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल:
मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड में जांच के दौरान चार महिला शिक्षकों की नियुक्ति का मामला सामने आया है। बताया गया है कि इन शिक्षकों का पता उत्तर प्रदेश और ओडिशा का है, जबकि उन्हें आरक्षित महिला कोटे के तहत नियुक्त किया गया। इस मामले ने स्थानीय स्तर पर भी सवाल खड़े किए हैं। जिला शिक्षा पदाधिकारी कुमार अरविन्द सिन्हा के अनुसार TRE-3 के तहत नियुक्त सभी शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच कराई जा रही है। जांच में केवल आवासीय प्रमाणपत्र ही नहीं, बल्कि आरक्षण से जुड़े दस्तावेज और नियुक्ति प्रक्रिया में इस्तेमाल किए गए अन्य रिकॉर्ड भी देखे जा रहे हैं। विभाग का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
दिव्यांग कोटे की नियुक्तियां भी जांच के दायरे में:
TRE-3 की काउंसिलिंग और नियुक्ति के दौरान ही दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को बिहार की आरक्षित श्रेणियों का लाभ मिलने का मामला सामने आने की बात कही गई थी। इसके बाद इस मुद्दे पर न्यायालय में भी मामला पहुंचा और विभिन्न जिलों से रिपोर्ट मांगी गई। अब विभाग आरक्षित श्रेणियों के साथ दिव्यांग कोटे के तहत हुई नियुक्तियों की भी जांच कर रहा है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किन-किन श्रेणियों में बाहर के अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली और उनके दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ। यदि जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित नियुक्तियों की वैधता पर भी सवाल उठ सकता है। हालांकि, किसी भी शिक्षक की नियुक्ति के संबंध में अंतिम कार्रवाई जांच पूरी होने और संबंधित अधिकारियों के निष्कर्ष के बाद ही तय होगी।
काउंसिलिंग प्रक्रिया भी जांच के घेरे में:
इस पूरे मामले में केवल अभ्यर्थियों के दस्तावेज ही नहीं, बल्कि काउंसिलिंग प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जा रही है। जिला शिक्षा पदाधिकारी के अनुसार जिस श्रेणी में अभ्यर्थी का परिणाम आया, उसी श्रेणी में उसकी काउंसिलिंग कराई गई। अब विभाग यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि काउंसिलिंग के दौरान आवासीय और आरक्षण प्रमाणपत्रों का सत्यापन किस तरीके से किया गया। काउंसिलिंग के रिकॉर्ड, संबंधित काउंटर और वहां तैनात अधिकारियों-कर्मचारियों की जानकारी भी जुटाई जा रही है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि यदि कोई दस्तावेज नियमों के अनुरूप नहीं था तो वह प्रक्रिया में आगे कैसे बढ़ गया।
शिक्षक नियुक्ति के साथ वेतन भुगतान में भी अनियमितता:
मुजफ्फरपुर में शिक्षा विभाग से जुड़ी जांच केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। इसी दौरान शिक्षकों के वेतन भुगतान में भी कथित अनियमितता का मामला सामने आया है। ऑडिट टीम की जांच में 250 से अधिक ऐसे शिक्षकों की जानकारी मिलने की बात कही गई है, जिन्हें एक से दो महीने तक दोहरा वेतन मिलने की संभावना बताई गई है। इनमें बड़ी संख्या उन शिक्षकों की बताई जा रही है, जो विशिष्ट शिक्षक से प्रधान शिक्षक बने हैं। ऑडिट टीम ने संबंधित शिक्षकों से बैंक खाते और वेतन भुगतान से जुड़े दस्तावेज मांगे हैं। पहले दिन करीब 35 शिक्षक अपने रिकॉर्ड लेकर जांच के लिए पहुंचे। कुछ शिक्षकों ने कथित अतिरिक्त भुगतान की राशि वापस करने के लिए चालान भी जमा किया है।
PRAN बनने के दौरान हुआ भुगतान का विवाद:
अधिकारियों के अनुसार विशिष्ट शिक्षक से प्रधान शिक्षक बनने वाले शिक्षकों का PRAN जनरेट किया जाना था। इसी प्रक्रिया के दौरान वेतन भुगतान की कार्रवाई आगे बढ़ी। आरोप है कि इसी अवधि में कुछ शिक्षकों को पुराने पद का वेतन और नए पद का वेतन दोनों मिल गया। अब ऑडिट टीम यह पता लगा रही है कि दोहरे भुगतान की स्थिति कैसे बनी। इसके लिए बैंक रिकॉर्ड, वेतन बिल और संबंधित विभागीय दस्तावेजों का मिलान किया जा रहा है। यदि किसी शिक्षक को गलती से अतिरिक्त वेतन मिला है तो उसकी वसूली की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। वहीं यदि जांच में जानबूझकर नियमों के उल्लंघन की बात सामने आती है तो जिम्मेदारी अलग तरीके से तय हो सकती है।
उपस्थिति रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा:
दोहरे वेतन के मामले में उपस्थिति रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो गया है। किसी शिक्षक के वेतन भुगतान के लिए संबंधित अवधि की उपस्थिति जरूरी होती है। ऐसे में जांच टीम यह देख रही है कि एक ही अवधि में अलग-अलग पदों के लिए किस आधार पर रिकॉर्ड तैयार हुआ। प्रधानाध्यापक और संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर वाले उपस्थिति रिकॉर्ड का भी मिलान किया जा रहा है। इससे यह पता लगाने की कोशिश होगी कि भुगतान से पहले आवश्यक सत्यापन प्रक्रिया पूरी हुई थी या नहीं।
फर्जी उपस्थिति की जांच के लिए दो सदस्यीय कमेटी:
मुजफ्फरपुर में ई-शिक्षा कोष पर कथित फर्जी उपस्थिति के मामलों की जांच के लिए जिलाधिकारी ने दो सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। कमेटी में वरीय उपसमाहर्ता विकास कुमार और अपर समाहर्ता संजय कुमार को शामिल किया गया है। दोनों अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। कमेटी अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ई-शिक्षा कोष पर दर्ज कथित उपस्थिति के मामले के अलावा अन्य शिक्षकों की उपस्थिति से जुड़े आरोपों की भी जांच करेगी। यह मामला विधान परिषद सदस्य वंशीधर व्रजवासी के अर्द्धसरकारी पत्र और माड़ीपुर निवासी अनूप कुमार की ओर से दिए गए आवेदन के बाद जांच के दायरे में आया है। शिकायतों में शिक्षा विभाग से जुड़ी अनियमितता, काम में बाधा और कथित फर्जी उपस्थिति जैसे आरोप शामिल हैं।
मध्याह्न भोजन के मामले की भी जांच:
शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में सकरा प्रखंड का मध्याह्न भोजन से संबंधित कथित गबन का मामला भी जांच के दायरे में है। अधिकारियों और जांच कमेटी की ओर से शिकायत में लगाए गए आरोपों तथा उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की जा रही है। इस तरह मुजफ्फरपुर में शिक्षा विभाग से जुड़े कई अलग-अलग मामलों की जांच एक साथ चल रही है। आरक्षण से लेकर वेतन भुगतान, उपस्थिति और मध्याह्न भोजन तक, विभागीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
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BPSC TRE-3 शिक्षक नियुक्ति में आरक्षण से जुड़ा मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं है। यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया में प्रमाणपत्र सत्यापन और काउंसिलिंग की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। अगर जांच में यह साबित होता है कि बिहार से बाहर के अभ्यर्थियों को नियमों के विपरीत राज्य की आरक्षित श्रेणी का लाभ दिया गया, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि गलती केवल अभ्यर्थियों के स्तर पर हुई या सत्यापन करने वाली व्यवस्था में भी चूक हुई।
दूसरी ओर, वेतन में दोहरा भुगतान और कथित फर्जी उपस्थिति जैसे मामले यह संकेत देते हैं कि शिक्षा विभाग में डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय भुगतान की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है। किसी भी कार्रवाई का आधार केवल आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेजी जांच और प्रमाण होना चाहिए। TRE-3 मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण बात जांच की अंतिम रिपोर्ट होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि कितने अभ्यर्थियों की नियुक्ति नियमों के अनुरूप हुई, कहां प्रक्रिया में चूक हुई और यदि किसी स्तर पर जानबूझकर अनियमितता की गई तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय होती है।
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