131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिरा: 850 सीटों वाली संसद और 2029 महिला आरक्षण पर लगा विराम

महिला आरक्षण, परिसीमन और 850 सीटों वाली लोकसभा… आखिर क्यों फेल हो गया मोदी सरकार का बड़ा दांव?

– महिला आरक्षण को जल्द लागू करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने का मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव संसद में आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सका। जानिए विधेयक क्यों गिरा, इसके पीछे की राजनीति क्या है और अब आगे क्या होगा।

 

सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक सुधार का बड़ा कदम बताया था। विपक्ष ने इसे राजनीतिक रणनीति कहा। कई दिनों तक चली बहस और जोरदार टकराव के बाद आखिरकार 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया। इसके साथ ही 2029 से महिला आरक्षण लागू करने की योजना और 850 सीटों वाली नई लोकसभा का प्रस्ताव भी फिलहाल रुक गया है।

यह सिर्फ एक विधेयक की हार नहीं है। इसने महिला आरक्षण, परिसीमन, उत्तर-दक्षिण राजनीतिक संतुलन और संविधान संशोधन की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

विधेयक: 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026
मुख्य उद्देश्य: महिला आरक्षण और परिसीमन का रास्ता साफ करना
मतदान: पक्ष में 298, विरोध में 230 वोट
जरूरी वोट: 352
कमी: 54 वोट
नतीजा: विधेयक गिर गया
क्या था सरकार का प्लान?

सरकार चाहती थी कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण जल्द लागू किया जाए। इसके साथ ही लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने का भी प्रस्ताव था। सरकार का तर्क था कि देश की आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन सांसदों की संख्या लगभग वहीं बनी हुई है। ऐसे में सांसदों पर काम का बोझ बढ़ गया है और जनता का प्रतिनिधित्व भी प्रभावित हो रहा है। सरकार का कहना था कि यदि लोकसभा की सीटें बढ़ेंगी तो सांसद अपने क्षेत्र में ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगे और लोकतंत्र मजबूत होगा।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई:

असल विवाद महिला आरक्षण से नहीं, बल्कि परिसीमन से शुरू हुआ। सरकार चाहती थी कि 2027 की जनगणना का इंतजार किए बिना 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन कराया जाए, ताकि 2029 के चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया जा सके। विपक्ष का कहना था कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक नक्शा बदलना चाहती है। यही कारण था कि कई विपक्षी दल इस प्रस्ताव के खिलाफ एकजुट हो गए।

2023 के कानून से क्या बदलना चाहती थी सरकार?

साल 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन) पारित किया था। उस कानून में साफ कहा गया था कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना पूरी होगी और उसके बाद परिसीमन कराया जाएगा। 131वें संशोधन विधेयक में सरकार इसी शर्त को हटाना चाहती थी। सरकार का तर्क था कि यदि 2027 तक इंतजार किया गया तो महिला आरक्षण लागू होने में कई और वर्ष लग सकते हैं।

आखिर संसद में क्यों हार गई सरकार?

लोकसभा में सरकार को 298 वोट मिले, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। पहली नजर में सरकार बहुमत में दिखाई दी, लेकिन संविधान संशोधन के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे विधेयकों के लिए विशेष बहुमत जरूरी होता है। मतदान के समय सदन में 528 सदस्य मौजूद थे। इसलिए विधेयक पारित करने के लिए 352 वोट चाहिए थे। सरकार 54 वोट कम जुटा सकी और विधेयक गिर गया। यह मोदी सरकार के लिए संसदीय स्तर पर सबसे बड़े झटकों में से एक माना जा रहा है।

850 सीटों वाली लोकसभा क्यों बनाना चाहती थी सरकार?

सरकार का कहना था कि 1971 के बाद देश की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है, लेकिन लोकसभा की सीटों में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। कई संसदीय क्षेत्रों में 30 से 40 लाख मतदाता हैं, जिससे सांसदों के लिए पूरे क्षेत्र तक पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है। नई व्यवस्था में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था। इससे नए संसदीय क्षेत्र बनते और प्रतिनिधित्व बढ़ता। उत्तर और दक्षिण भारत आमने-सामने क्यों आ गए?

यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा था। दक्षिण भारत के राज्यों खासकर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना का कहना था कि उन्होंने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण पर काम किया है। यदि सीटों का बंटवारा केवल आबादी के आधार पर होगा तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की सीटें तेजी से बढ़ जाएंगी। दक्षिणी राज्यों को डर था कि इससे संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव घट जाएगा और राष्ट्रीय नीतियों पर उनकी भूमिका कमजोर हो सकती है।

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