SIR in Jharkhnad: झारखंड की वोटर लिस्ट से 43.61 लाख नाम क्यों हटे? SIR के बाद सामने आया पूरा गणित

SIR in Jharkhnad: झारखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग ने नई ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी कर दी है। इस सूची के सामने आते ही सबसे अधिक चर्चा जिस आंकड़े की हो रही है, वह है 43.61 लाख मतदाताओं के नाम हटाया जाना। इतनी बड़ी संख्या ने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या इतनी बड़ी संख्या में मतदाता अचानक गायब हो गए? क्या यह केवल तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा है या इसके पीछे कोई और वजह है?

चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से की गई है। आयोग के अनुसार, हटाए गए प्रत्येक नाम के पीछे निर्धारित प्रक्रिया और स्पष्ट कारण मौजूद हैं। इनमें स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण, सत्यापन के दौरान अनुपस्थित मिलना, मृत्यु, डुप्लीकेट पंजीकरण और आवश्यक फॉर्म जमा नहीं करना जैसे कारण शामिल हैं।

SIR क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी:
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची का घर-घर जाकर सत्यापन किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सूची में केवल वही लोग बने रहें, जो वास्तव में उस क्षेत्र के पात्र मतदाता हैं। इस अभियान के दौरान बूथ लेवल अधिकारी (BLO) प्रत्येक घर तक पहुंचकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से दूसरे स्थान पर रह रहा है, उसकी मृत्यु हो चुकी है, उसका नाम दो जगह दर्ज है या उसने निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं की है, तो उसका नाम ड्राफ्ट सूची से हटाया जा सकता है। झारखंड में यह अभियान 30 जून से 29 जुलाई तक चलाया गया। इस दौरान लाखों मतदाताओं से एन्यूमरेशन फॉर्म भरवाए गए और उनके दस्तावेजों का सत्यापन किया गया।

SIR से पहले और बाद में कितने मतदाता रहे:
झारखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के. रवि कुमार के अनुसार, SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 2 करोड़ 64 लाख 63 हजार 236 मतदाता पंजीकृत थे। सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में यह संख्या घटकर 2 करोड़ 21 लाख 1 हजार 249 रह गई है। इस दौरान लगभग 83.51 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने एन्यूमरेशन फॉर्म समय पर जमा किए। वहीं जिन लोगों ने निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं की या जिनके रिकॉर्ड में गड़बड़ियां मिलीं, उनके नाम सूची से हटा दिए गए।

सबसे बड़ा कारण – स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए मतदाता:
चुनाव आयोग के अनुसार हटाए गए कुल 43.61 लाख नामों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी उन लोगों की है, जो अपने पुराने पते से स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर शिफ्ट हो चुके हैं। ऐसे मतदाताओं की संख्या 15 लाख 92 हजार से अधिक है। यानी कुल हटाए गए नामों का लगभग 36.5 प्रतिशत इसी श्रेणी में आता है। दरअसल, कई लोग नौकरी, शिक्षा, व्यवसाय या पारिवारिक कारणों से दूसरे शहर या राज्य में बस जाते हैं, लेकिन पुराने पते पर उनका नाम वर्षों तक मतदाता सूची में बना रहता है। SIR के दौरान ऐसे मामलों की पहचान कर सूची को अपडेट किया गया।

दूसरा सबसे बड़ा कारण – सत्यापन के दौरान नहीं मिले मतदाता:
मतदाता सूची से नाम हटने का दूसरा बड़ा कारण वे लोग रहे, जिनका सत्यापन नहीं हो सका। चुनाव आयोग के अनुसार 14 लाख 50 हजार से अधिक मतदाता ऐसे पाए गए, जो बूथ लेवल अधिकारियों के घर-घर सत्यापन अभियान के दौरान उपलब्ध नहीं थे या जिनका पता नहीं चल सका। यह संख्या कुल हटाए गए नामों का लगभग 33.2 प्रतिशत है। हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि ऐसे मतदाता वास्तव में पात्र हैं तो वे दावा प्रस्तुत कर अपने नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं।

मृत मतदाताओं के नाम भी बड़ी संख्या में हटे:
SIR अभियान के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम भी सामने आए, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी लेकिन उनका नाम अब भी मतदाता सूची में दर्ज था। आंकड़ों के अनुसार 7 लाख 63 हजार से अधिक मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए। यह कुल हटाए गए नामों का लगभग 17.5 प्रतिशत है। चुनाव आयोग का मानना है कि मृत व्यक्तियों के नाम सूची में बने रहने से चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए समय-समय पर ऐसे रिकॉर्ड अपडेट करना आवश्यक होता है।

डुप्लीकेट वोटर भी आए सामने:
सत्यापन अभियान में ऐसे कई मामले भी सामने आए, जिनमें एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज था। जांच के बाद 4 लाख 38 हजार से अधिक डुप्लीकेट पंजीकरण हटाए गए। यह कुल हटाए गए नामों का लगभग 10 प्रतिशत है। चुनाव आयोग का कहना है कि एक व्यक्ति केवल एक ही निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकता है। इसलिए दोहरी प्रविष्टियों को हटाना चुनावी पारदर्शिता के लिए जरूरी कदम है।

फॉर्म जमा नहीं करने वालों के नाम भी हटे:
मतदाता सूची संशोधन के दौरान एन्यूमरेशन फॉर्म भरना और समय पर जमा करना अनिवार्य था। करीब 1 लाख 16 हजार मतदाताओं ने या तो फॉर्म जमा नहीं किया या उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। ऐसे मामलों में आयोग ने निर्धारित नियमों के तहत उनके नाम ड्राफ्ट सूची से हटा दिए। हालांकि यदि संबंधित व्यक्ति स्वयं को पात्र मतदाता साबित कर देते हैं, तो दावा प्रक्रिया के माध्यम से उनका नाम फिर जोड़ा जा सकता है।

पांच कारणों में समझिए पूरा गणित:
चुनाव आयोग के अनुसार हटाए गए 43.61 लाख नामों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
15.92 लाख – स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित।
14.50 लाख – सत्यापन के दौरान अनुपस्थित या पता नहीं चला।
7.63 लाख – मृत मतदाता।
4.38 लाख – डुप्लीकेट पंजीकरण।
1.16 लाख – फॉर्म जमा नहीं किया या हस्ताक्षर से इनकार किया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि किसी एक कारण से इतनी बड़ी संख्या में नाम नहीं हटाए गए, बल्कि कई अलग-अलग श्रेणियों में सत्यापन के बाद यह कार्रवाई हुई।

अब आगे क्या होगी प्रक्रिया:
ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद चुनाव आयोग ने दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर भी दिया है। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से सूची से हट गया है, उसकी जानकारी गलत दर्ज हुई है या किसी अन्य प्रकार की त्रुटि है, तो वह निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन कर सकता है। दावों और आपत्तियों की जांच के बाद चुनाव आयोग अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करेगा। इसी अंतिम सूची के आधार पर आगामी चुनावों में मतदान कराया जाएगा।

क्यों अहम है यह संशोधन:
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला होती है। यदि सूची में मृत, डुप्लीकेट या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बने रहते हैं, तो चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। इसी वजह से चुनाव आयोग समय-समय पर विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाता है ताकि सूची वास्तविक मतदाताओं के अनुरूप बनी रहे। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि दावा-आपत्ति प्रक्रिया के बाद अंतिम मतदाता सूची में कितने नाम दोबारा जुड़ते हैं और यह संशोधन आगामी चुनावी समीकरणों को किस तरह प्रभावित करता है।

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